मथुरा। ब्रज की धरती ने मंगलवार को अपने ऐसे संत को खो दिया, जिसने साधना को केवल मठ-मंदिर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि गौसेवा, पर्यावरण संरक्षण और ब्रज की प्राचीन विरासत की रक्षा को जीवन का संकल्प बना लिया था। बरसाना स्थित मान मंदिर के संस्थापक और पद्मश्री संत रमेश बाबा का मंगलवार दोपहर निधन हो गया। वह काफी समय से अस्वस्थ चल रहे थे। मान मंदिर में उनके निधन की खबर मिलते ही ब्रज में शोक की लहर दौड़ गई।
रमेश बाबा को ब्रज में विरक्त संत के साथ पर्यावरण पुरोधा के रूप में भी जाना जाता था। कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी प्राचीन पहाड़ियों, वन-उपवन और ब्रज के प्राकृतिक स्वरूप को बचाने के लिए उन्होंने वर्षों तक जनआंदोलन किए। उनका मानना था कि ब्रज की पहचान केवल मंदिरों और धार्मिक स्थलों से नहीं, बल्कि उसकी पहाड़ियों, कुंडों, वनों और गौचर भूमि से भी है। इसी सोच के साथ उन्होंने ब्रज के संरक्षण को जनअभियान का रूप दिया।
दो गायों से शुरू हुई गौसेवा बनी बड़ा अभियान
गौसेवा रमेश बाबा के जीवन का सबसे प्रमुख संकल्प रही। मान मंदिर सेवा संस्थान के अनुसार माताजी गौशाला की शुरुआत सात जुलाई 2007 को सड़क से बचाई गई केवल दो गायों से हुई थी। इसके बाद गौशाला का लगातार विस्तार हुआ और यह हजारों गोवंश की सेवा का बड़ा केंद्र बन गई। संस्था वर्तमान में 50 हजार से अधिक गायों की सेवा का दावा करती है।
गौसेवा के साथ उन्होंने ब्रज की हरियाली और प्राकृतिक संपदा को बचाने पर भी जोर दिया। उनकी पहल ने धार्मिक आस्था को पर्यावरण और पशु संरक्षण से जोड़ने का काम किया। इसी सामाजिक और जनसेवा के योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
ब्रज के लिए एक युग का अवसान
रमेश बाबा का प्रभाव केवल मान मंदिर और बरसाना तक सीमित नहीं रहा। ब्रज के गांवों, संत समाज और गौसेवा से जुड़े लोगों के बीच उनका व्यापक प्रभाव था। उनके निधन की खबर फैलते ही अनुयायियों और संत समाज में शोक का माहौल है। भक्तों के लिए वह ऐसे संत थे, जिन्होंने वैराग्य के साथ सेवा को जीवन का आधार बनाया।
रमेश बाबा के निधन के साथ ब्रज ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है, जिसने अपनी पूरी साधना को राधारानी की नगरी, गोवंश और ब्रज की प्रकृति की सेवा में लगा दिया। अब उनके पीछे उनकी साधना, गौसेवा का विशाल अभियान और ब्रज संरक्षण की वह विचारधारा है, जिसे आगे बढ़ाना उनके अनुयायियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।