कोर्ट बोला— ‘कोई सहानुभूति के हकदार नहीं’
सभी सजा साथ-साथ चलेंगे
जेल में बिताई अवधि भी सजा में समायोजित होगी
हाथरस। अपर सत्र न्यायाधीश (कक्ष संख्या-01), हाथरस की अदालत ने 13 साल पुराने चर्चित लूटकांड में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। न्यायालय ने थाना मुरसान से संबंधित अपराध संख्या 177/2012 के मामले में 7 अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए कड़ी सजा सुनाई है।
अदालत का फैसला
न्यायालय ने हरिओम पाराशर उर्फ कनैटा, महेश सिंह, केशव पहलवान, हरिकिशन, मनीष पुजारी उर्फ मनीष कुमार, टिल्लू उर्फ कृष्ण गोपाल और पिन्टू उर्फ विक्रम को निम्नलिखित धाराओं के तहत दंडित किया है:
धारा 395 IPC (डकैती): प्रत्येक को 10-10 वर्ष का सश्रम कारावास और 10-10 हजार रुपये जुर्माना। (जुर्माना न देने पर 1 वर्ष का अतिरिक्त कारावास)।
धारा 397 IPC (लूट के दौरान हथियार का प्रयोग): प्रत्येक को 10-10 वर्ष का सश्रम कारावास और 10-10 हजार रुपये जुर्माना।
धारा 412 IPC (लूटी हुई संपत्ति को जानते हुए प्राप्त करना): प्रत्येक को 10-10 वर्ष का सश्रम कारावास और 15-15 हजार रुपये जुर्माना।
नोट: कोर्ट ने आदेश दिया कि सभी सजाएं एक साथ (Concurrently) चलेंगी तथा अभियुक्तों द्वारा जेल में बिताई गई पूर्व अवधि धारा 428 CrPC के तहत समायोजित की जाएगी।
क्या था पूरा मामला?
9 जुलाई 2012 को भरतपुर निवासी महेंद्र सिंह अपने साथी गोविंद के साथ हाथरस से 11,88,000 रुपये की नकदी लेकर जा रहे थे। जैसे ही वे मुरसान कस्बे के फाटक के पास पहुंचे, काले रंग की पल्सर बाइक पर सवार बदमाशों ने उनकी स्विफ्ट डिजायर कार को रोक लिया। तमंचे के बल पर कार की चाबी छीन ली गई और 7-8 बदमाशों ने घेरकर गाड़ी की डिग्गी में रखी नकदी से भरी अटैची, मतदाता पहचान पत्र, पैन कार्ड और मोबाइल लूट लिए। इसके बाद बदमाश फायरिंग करते हुए मौके से फरार हो गए।
पुलिस ने 25 जुलाई 2012 को मुठभेड़ के बाद बदमाशों को लूटे गए माल व अवैध तमंचों के साथ गिरफ्तार किया था। इस मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से सहायक शासकीय अधिवक्ता (AGA) गोविंद वशिष्ठ ने पैरवी की। उनके द्वारा प्रस्तुत ठोस साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर सत्र परीक्षण संख्या 115/2013 को लीडिंग केस मानते हुए न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाया।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: फैसले में अदालत ने टिप्पणी की कि अभियुक्तों का यह कृत्य अत्यंत जघन्य है और सभ्य समाज में कानून के शासन के पूरी तरह विपरीत है। ऐसे अपराध करने वाले व्यक्ति किसी भी प्रकार की सहानुभूति के हकदार नहीं हैं।