यमुना में छलांग लगाकर महावन पहुंच गए थे हकीम बृजलाल वर्मन

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14 बार गए जेल जाते-जाते बिक गई थी पूर्वजों की चल अचल संपत्ति
विभिन्न आंदोलन में भाग लेने वाले स्वतंत्रता सेनानी विधान परिषद के सदस्य भी रहे

मथुरा। आजादी के दीवाने हकीम बृजलाल वर्मन 14 बार जेल गए। जेल जाते-जाते उनके पूर्वजों की चल-अचल सम्पत्ति बिक गई। एक आयोजन के दौरान जब अंग्रेज पुलिस उनको पकड़ने लगी तो वह यमुना में छलांग लगाकर महावन पहुंच गए थे। वह विधान परिषद के सदस्य भी रहे।
प्रसिद्ध अस्थि रोग विशेषज्ञ एवं वर्मन नर्सिंग होम के संचालक डा. एस के वर्मन ने बताया कि उनके दादा एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हकीम बृजलाल वर्मन ब्रज के महान क्रांतिकारी थे। जीवन के अंतिम सोपान में वह विधानसभा उत्तर प्रदेश में एम एल सी एवं जिला परिषद मथुरा के अध्यक्ष भी रहे। वह बढ़ चढ़कर विधानसभा की डिबेट में हिस्सा लिया करते थे।

कृष्णापुरी निवासी हकीम जी 14 बार जेल गए और लगातार जेल जाते-जाते पूर्वजों की चल अचल संपत्ति जिसमें सात घर शामिल थे, बिक गए थे।उस वक्त के अंग्रेज कलेक्टर फ्रीमेंट ने उनके द्वारा अगुवाई करते जुलूस पर लाठीचार्ज भी कराया था। स्वाधीनता संग्राम के वक्त विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार आंदोलन में घर की महिलाओं का सामान होली गेट पर आग के हवाले कर दिया था। स्थानीय जमुना बाग में दाल बाटी के दौरान पुलिस इन्हें गिरफ्तार करने पहुंची तो आजादी के यह दीवाना यमुना में छलांग लगाकर महावन पहुंच गए और पुलिस हाथ मलती रह गई थी। उन दिनों अखबार निकालना भी एक बहुत बड़ी बात समझी जाती थी। हकीम बृजलाल वर्मन ने बृजवासी नाम का अखबार भी निकाला कुशल संपादन भी किया और अंग्रेजों के खिलाफ जमकर लिखा।

1911 में मथुरा में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की। राष्ट्रीय इंटर कॉलेज राया के अध्यक्ष रहे एवं ब्रज आश्रम की स्थापना की। प्रेम महाविद्यालय वृंदावन के अध्यक्ष भी रहे। सहयोग आंदोलन में उनकी भागीदारी के कारण उन्हें 1922 में तीन महीने की कैद या 50 रुपये जुर्माना हुआ। नमक सत्याग्रह (1930) में शामिल होने पर उन्हें एक वर्ष का कारावास मिला। सविनय अवज्ञा आंदोलन (1932) में भाग लेने पर एक बार फिर उन्हें एक वर्ष की जेल और 200 रुपये जुर्माना हुआ। व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन (1941) के दौरान उन्हें 1 वर्ष की कैद और 500 रुपये जुर्माना लगाया गया। भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में भागीदारी के कारण वे नज़रबंद भी किए गए। इसके अलावा वे 1908 से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे और मथुरा ज़िले में कांग्रेस संस्थापक, पूर्व जिला बोर्ड अध्यक्ष और ज़िला कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे।

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