कैंसर और इसके इलाज से जुड़े मिथक तोड़ने की जरूरत

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मथुरा। कैंसर और इसके इलाज को लेकर कई मिथक हैं। सबसे बड़ा मिथक यह है कि कैंसर इलाज के योग्य नहीं है। इन मिथकों को तोड़ना इसलिए जरूरी है, ताकि मरीज इलाज में देरी न करें और शुरुआती स्टेज में ही विशेषज्ञ के पास पहुंच जाएं। इसका कारण यह है कि शुरुआती स्टेज पर पता चल जाए और सही इलाज मिले तो कैंसर के रोकथाम की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है। आईएमए और मथुरा सोसायटी ऑफ एनेस्थीसियोलॉजी के सहयोग से स्थानीय होटल में हुई सेमिनार में यह बातें राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के विशेषज्ञों ने कहीं।


डॉ. सन्नी मलिक ने पैंक्रियाटिक कैंसर के मामले में पेन मैनेजमेंट के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि पैंक्रियाटिक कैंसर के करीब 70 प्रतिशत मरीजों को पेट के ऊपरी हिस्से और पीठ में दर्द होता है। इस दर्द को नर्व ब्लॉक के माध्यम से बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। डॉ. पायल मल्होत्रा ने बच्चों में होने वाले कैंसर से जुड़े मिथकों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि बच्चों और बड़ों में होने वाले कैंसर एक जैसे नहीं होते। बच्चों में होने वाले कैंसर इलाज के ज्यादा योग्य होते हैं। बच्चों में होने वाला कैंसर बहुत दुर्लभ है, लेकिन इसके संकेतों को समझना जरूरी है। डॉ. सीमा सिंह ने बताया कि स्तन में होने वाली हर गांठ कैंसर नहीं होती है। आमतौर पर 30 से 40 प्रतिशत गांठ के मामले ही कैंसर के होते हैं। यहां तक कि यदि कैंसर है, तब भी बहुत घबराने की बात नहीं है, क्योंकि इसका इलाज संभव है।
सेमिनार में आईएमए के अध्यक्ष डॉ.संजय गुप्ता,सचिव प्रवीन गोयल, एमएसए के अध्यक्ष डॉ.पवन अग्रवाल,डॉ.अंकित कुमार, आईएमए के उपाध्यक्ष डॉ.गौरव भारद्वाज, डॉ.डीपी गोयल, डॉ अवधेश अग्रवाल, डॉ.अशोक अग्रवाल, डॉ.आशीष गोपाल, डॉ.विवेक अस्थाना,डॉ.रवि जैन, डॉ.पंकज शर्मा,डॉ.शिशिर अग्रवाल,डॉ.दिलीप शर्मा,डॉ.विशाल उप्पल आदि चिकित्सक मौजूद थे।

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