मथुरा। लंबे समय से सुखाड़ (सूखा—पानी की कमी) झेल रहीं बुंदेलखण्ड (उप्र के झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर व मप्र के टीकमगढ़, छतरपुर, निवाड़ी) की धरती से करीब 500 जल सहेलियां यमुना को अविरल एवं निर्मल बनाने की मांग को लेकर पचनद धाम से लगभग 300 किमी की पदयात्रा करते हुए आज वृन्दावन पहुंचीं। यहां से यह यात्रा 26 फरवरी को दिल्ली के यमुना किनारे वासुदेव घाट पर सम्पन्न होगी।
वर्ष 2011 से पीने के पानी के लिए नदियों को पुनर्जीवित करने का भागीरथी संकल्प लेकर काम कर रही ये जल सहेलियां वहीं हैं, जिनकी सोच, समझ और कोशिशों की तारीफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 29 सितम्बर 2024 के ‘मन की बात’ प्रसारण में की है और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा इनमें से तीन सहेलियों (शारदा बंसकार, गीता देवी व गंगा राजपूत) को विज्ञान में आयोजित कार्यक्रम में ‘जल—सुजल’ सम्मान से नवाजा जा चुका है।
अब तक करीब 4000 महिलाएं जल सहेली फाउण्डेशन की सदस्य बन चुकी हैं। ये सहेलियां उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश में फैले बुंदेली भाषी इलाकों में जल संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रयास कर रही हैं। इन्होंने छोटे-छोटे प्रयासों से ही कई तालाबों और नदियों (कनेरा, घुरारी, बरुआ, बारगी, बछेड़ी और खोड़न आदि) को पुनर्जीवित किया है। उनके काम की गूंज दिल्ली तक भी पहुंच चुकी है।
इसीलिए इस बार इन्हीं में से 500 जल सहेलियों का एक दल 29 जनवरी के घने कोहरे को काटते, ठण्ड से कपकपाते हुए जालौन स्थित यमुना, चंबल, सिंध, कुंवारी व पहुज के संगम — पचनद धाम से दिल्ली के वासुदेव घाट तक की 450 किमी की पदयात्रा पर निकली हैं। सरकार के साथ—साथ इनकी समाज से भी मांग है कि जब वे अपने घर को साफ—सुथरा रखने के लिए दिन भर प्रयास करते हैं, हर दिन साफ करते हैं, तो नदियों आदि जलदायों को भी उसी प्रकार स्वच्छ रखने का प्रयास करें। अगर कहीं प्रदूषण हो, तो उसे भी मिटाने को आगे आएं।
इन सहेलियों ने वृन्दावन के केसी घाट पर यमुना में फूल-पत्ती और अन्य पूजन सामग्री देख उसे निकाल कर ही दम लिया। वे इसी प्रकार, रास्ते भर गांव—देहात, शहरों में लोगों से संवाद करते जल संरक्षण समितियां बनाती चली आ रही हैं। लोगों को प्रदूषणमुक्त, अविरल—निर्मल यमुना का संदेश देती चल रही हैं।
जल सहेली समिति की राष्ट्रीय अध्यक्ष पुष्पा कुशवाहा ने वहां मौजूद लोगों से अपील भी की कि यहां आने वाले लोग यमुना को केवल धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में ही न देखें, बल्कि भविष्ण के जल स्रोत के रूप में मानते हुए सहेजने का भी प्रयास करें। हमें हमारे सभी प्राकृतिक संसाधनों को बचाकर रखने की महती आवश्यकता है।
उन्होंने कहा, इसके लिए समाज की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी नदी के संरक्षण का दायित्व समझते हुए आगे आना होगा। हम नदी पुनर्जीवन की इसी सीख को आगे बढ़ाने के लिए यह यात्रा कर रहे हैं। अब तक हम 50 से अधिक विद्यालयों, गाँवों में पदयात्रा के माध्यम से यमुना पुनर्जीवन पर संवाद कर चुके हैं। गाँव-गाँव जाकर यमुना संरक्षण समितियों से लोगों को जोड़ रहे हैं और यह संदेश दे रहे हैं कि छोटे-छोटे सामूहिक प्रयासों से भी नदियों का संरक्षण संभव है।
जल सहेली संगठन के संस्थापक संजय सिंह का मानना है कि नदियां हमारी साझा विरासत हैं। इन्हें केवल सरकार या केवल समाज के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता; दोनों को मिलकर काम करना होगा, तभी सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।
उन्होंने कहा, ‘यमुना केवल एक नदी नहीं, बल्कि संस्कृति और आस्था का प्रतीक है, जिसे बचाए रखना अत्यंत आवश्यक है। लगभग 1250 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में बहने वाली यमुना नदी पचनद में नया जीवन पाती है और प्रयागराज में संगम पर पहुंचकर गंगा में समा जाती है। इस नदी का क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और जीवन से गहरा संबंध है, इसलिए इसकी अविरलता और निर्मलता के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।’
सिंह ने कहा, मथुरा—वृन्दावन पहुंचकर मालूम पड़ा है कि उत्तर प्रदेश को तो यमुना से उसके हिस्से का पानी मिल ही नहीं पा रहा। हरियाणा में ही अधिकतम यमुना जल का शोषण कर लिया जाता है। इसीलिए अपने एकमात्र तीर्थस्थल पर पहुंचकर तो यमुना और भी दयनीय नदी का रूप धारण कर लेती है। क्योंकि, दिल्ली में दूषित जल—मल मिलने के बाद जो सहायक नदियां यमुना में मिलती हैं, वे उसे पहले से और अधिक प्रदूषित करती जाती हैं।’
उन्होंने कहा, ‘हम भारत सरकार से मांग करेंगे कि वह दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखण्ड आदि राज्यों से समन्वय स्थापित कर उत्तर प्रदेश के उसके हिस्से का पानी देने की व्यवस्था करे। जिससे गंगा में विलीन से पूर्व भी वह अविरल व निर्मल बहती नजर आए।’
बुन्देलखंड में नदियों के पुनर्जीवन हेतु किए गए अपने कार्यों से हमने 6 नदियों के पुनर्जीवन किया है अब इन्ही प्रयासों के अनुभवों से सीखकर यह अनुभव किया है कि केवल सरकार के माध्यम से नदियों की अविरलता एवं निर्मलता सुनिश्चित नहीं की जा सकती। यात्रा के दौरान समाज से अनेक महत्वपूर्ण सुझाव भी प्राप्त हो रहे हैं, जिन्हें हम दिल्ली पहुँचकर संबंधित मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।